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Festive Sale: ऑनलाइन शॉपिंग में कैशबैक, रिवॉर्ड प्वॉइंट, नो कॉस्ट EMI का जान लें गणित; नहीं तो होगा नुकसान

फेस्टिव सीजन को देखते हुए अमेजन, मिंत्रा, पेटीएम मॉल और फ्लिपकार्ट की फेस्टिव सेल शुरू हो चुकी हैं. इन सेल में कपड़ों से लेकर अप्लायंसेज तक को अच्छे खासे डिस्काउंट के साथ सस्ते दामों पर खरीदा जा सकता है. सेल में खरीदारी पर ग्राहकों को छूट के अलावा कैशबैक, रिवॉर्ड पॉइंट की भी पेशकश की जाती है. इसके अलावा एक फंडा नो कॉस्ट EMI पर खरीद भी रहता है. अगर आप भी इस फेस्टिव सीजन सेल में खरीददारी की सोच रहे हैं तो पहले जान लें कैशबैक, रिवॉर्ड पॉइंट और नो कॉस्ट EMI के बारे में….

कैशबैक

कैशबैक का फंडा यह है कि ग्राहक के खरीदारी कर लेने के बाद उसने जो पेमेंट किया है, उसका एक निश्चित हिस्सा ग्राहक को वापस मिल जाता है. इसी मायने में यह छूट से थोड़ा अलग कहा जा सकता है क्योंकि छूट ग्राहक को पेमेंट से पहले ही मिल जाती है. फेस्टिव सेल में चुनिंदा मोबाइल वॉलेट्स या बैंक कार्ड के जरिए प्रॉडक्ट खरीदने पर कैशबैक की पेशकश की जाती है. अगर कैशबैक इंस्टैंट है तो इसे तुरंत ग्राहक के वॉलेट या उससे लिंक बैंक अकाउंट में क्रेडिट कर दिया जाता है. लेकिन अगर इंस्टैंट कैशबैक नहीं है तो इसके क्रेडिट होने के लिए 24 घंटे या 48 घंटे तक की अवधि निश्चित होती है. यानी इसके अंदर आपके पास कैशबैक आता है.

कई बार कंपनियां कैशबैक के लिए एक न्यूनतम रकम तय करती हैं. यानी उससे कम की खरीदारी पर कैशबैक नहीं मिलता. ऐसे में कैशबैक पाने के लिए खरीदार को उस मिनिमम रकम की खरीदारी करनी ही होती है. यह भी ध्यान रखें कि अगर किसी प्रॉडक्ट का दाम सेल में पहले के मुकाबले बढ़ चुका है और उसके बाद कैशबैक दिया जा रहा है तो यह असली छूट नहीं है.

रिवॉर्ड प्वॉइंट

कई बार सेल में कस्टमर्स को कैशबैक के बजाय रिवॉर्ड प्वॉइंट की पेशकश की जाती है. जैसे कि हर 100 रुपये की पेमेंट पर 1 रिवॉर्ड प्वॉइंट और 1 रिवॉर्ड प्वॉइंट मतलब 1 रुपया. यानी ये रिवॉर्ड प्वॉइंट एक तरह का कैशबैक ही होते हैं लेकिन अंतर इतना होता है कि इन्हें अगली खरीदारी के वक्त ही भुनाया जा सकता है. एक तरह से रिवॉर्ड प्वॉइंट के जरिए कस्टमर को फिर से खरीदारी करने के लिए बढ़ावा दिया जाता है.

कुछ कं​पनियां अगली खरीदारी में भुगतान किए जाने वाले अमाउंट के बराबर रिवॉर्ड प्वॉइंट अमाउंट उपलब्ध होने पर पूरी खरीदारी इसी को भुना कर करने की सुविधा देती हैं. यानी कस्टमर बिना एक भी पैसा दिए इन्ही रिवॉर्ड प्वॉइंट से खरीदारी कर सकता है. वहीं कुछ कंपनियां एक बार में रिवॉर्ड पॉइंट का कुछ ही हिस्सा जैसे 10 या 20 फीसदी ही इस्तेमाल करने की बंदिश रखती हैं.

नो कॉस्ट EMI

किसी महंगे प्रॉडक्ट को खरीदने के लिए ग्राहक अक्सर EMI का सहारा लेते हैं. EMI यानी किस्तों पर कोई प्रॉडक्ट या सर्विस लेते हैं तो आपको एक तय अवधि तक समान अमाउंट एक तय वक्त पर देना होता है. साथ ही ब्याज भी लगता है. यह ब्याज EMI सुविधा लेने के एवज में देना होता है. यानी अगर आपने 12000 रुपये की चीज खरीदी है और इसे इसका पेमेंट EMI पर 3 महीने तक करना है तो आपको 4000 रुपये की किस्त प्लस ब्याज देना होगा.

वहीं, नो-कॉस्ट EMI में ग्राहक को केवल चीज का दाम ही EMI में चुकाना होता है और कोई ब्याज नहीं देना होता है. यानी अगर 12000 की चीज 3 माह तक दी जाने वाली EMI पर खरीदी है तो हर माह केवल 4000 रुपये का भुगतान करना होगा. यानी आपकी जेब से केवल 12000 रुपये ही जाएंगे.

दरअसल नो-कॉस्ट EMI ग्राहकों को लुभाने का एक जरिया होता है. साधारण EMI में दिए जाने वाले ब्याज की तरह कंपनियां इसमें भी ब्याज काउंट कर लेती हैं. इसके दो तरीके होते हैं. पहला यह कि कंपनियां नो-कॉस्ट EMI ऑप्शन देने के साथ-साथ प्रॉडक्ट के एकमुश्त पेमेंट पर डिस्काउंट देती हैं. जबकि अगर नो-कॉस्ट EMI को चुना तो पर प्रॉडक्ट पूरी कीमत पर खरीदना होता है. दूसरा तरीका यह कि ब्याज प्रॉडक्ट कॉस्ट में ही शामिल कर दिया जाता है. नो-कॉस्ट EMI पर भी ब्याज लेने की वजह यह है कि RBI की ओर से जीरो परसेंट इंट्रेस्ट को परमीशन नहीं है.

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